KAHANIYA

💐घर की असली ताकत💐

शांत नगर के एक सुंदर मोहल्ले में कस्वां परिवार रहता था। परिवार बड़ा था, पर एकजुट — सास-ससुर, दो बेटे, दोनों की पत्नियाँ और चार नन्हें बच्चे। बड़े बेटे की पत्नी रीना स्कूल में अध्यापिका थी और छोटी बहू काजल गृहिणी। दोनों के बीच रिश्ता ऐसा था जैसे सगी बहनों का हो।

पर हर घर की तरह इस घर में भी कभी-कभी बाहर से आने वाले लोग अपने शब्दों से दरारें डालने की कोशिश करते।

एक दिन कई सालों बाद परिवार में बुआ सास आईं — यानी ससुर जी की बड़ी बहन सुधा बुआ। उम्र का असर तो था, पर बोलने का अंदाज़ अब भी वही तीखा और टोका-टाकी से भरा।

सुबह-सुबह बुआ जी ने देखा — रीना जल्दी-जल्दी तैयार होकर घर के छोटे-मोटे काम निपटा रही थी। वो बच्चों के टिफिन चेक कर रही थी, सबकी पानी की बोतलें भर रही थी, और फिर टिफिन बैग में रखती जा रही थी।
उधर काजल रसोई में लगी थी — दूध उबलने की आवाज़ के साथ पराठों की खुशबू फैल रही थी। कुछ देर में रीना रसोई में आई, सबका नाश्ता प्लेट में सजाया और सबको परोस दिया। फिर मुस्कुराकर बोली —
“माँ जी, बच्चों का टिफिन टेबल पर रख दिया है। मैं निकल रही हूँ।”

काजल बोली —
“दीदी, आपका डिब्बा?”

“ले लिया प्यारी, अब तुम भी नाश्ता कर लो।”
रीना स्नेह भरी आवाज़ में बोली और ऑफिस के लिए निकल गई।

बुआ जी ने ये सब देखा तो चेहरे पर एक व्यंग्य भरी मुस्कान आ गई।
कुछ देर बाद जब काजल सास और बुआ जी के साथ बैठी तो सुधा बुआ बोलीं —
“छोटी बहू, तेरी जेठानी तो खूब हुकुम चलाती है। सुबह से देख रही हूँ — तू रसोई में लगी थी और वो बस सबको परोसने का दिखावा कर रही थी। काम सारा तू करे, और वाहवाही वो ले जाए!”

काजल थोड़ा मुस्कुराई, फिर बोली —
“ऐसी कोई बात नहीं है, बुआ जी।”

“अरे तू भोली है, पर मैं सब समझती हूँ।”
बुआ जी ने कहा, जैसे उन्होंने कोई बड़ा रहस्य पकड़ लिया हो।

काजल ने अब गहरी सांस ली और बोली —
“बुआ जी, आपको रीना दीदी का सबको नाश्ता परोसना दिखा, पर शायद ये नहीं दिखा कि उन्होंने मुझे जबरदस्ती बिठाकर नाश्ता करवाया। अगर वो नहीं होतीं, तो मैं तो आज भी भूखी रह जाती। दीदी हमेशा कहती हैं कि ‘काजल, पहले खुद खा ले, वरना ठंडा हो जाएगा।’ वो सुबह मंदिर की सफाई करती हैं ताकि मम्मी जी को पूजा करने में सहजता रहे। ऑफिस जाते वक्त वो बच्चों के स्कूल की कॉपी, पेंसिल तक जांच लेती हैं। और शाम को लौटते हुए सब्जियाँ भी लेकर आती हैं क्योंकि रात में बाजार बंद हो जाता है।”

काजल ने ज़रा रुकी, फिर आगे कहा —
“बुआ जी, वो मेरी जेठानी नहीं, मेरी बड़ी बहन हैं। जब मैं थक जाती हूँ, तो वो बच्चों का होमवर्क देख लेती हैं। जब वो परेशान होती हैं, तो मैं उनकी बातें सुनती हूँ। हम दोनों एक-दूसरे का सहारा हैं।”

बुआ जी के चेहरे पर हल्की शर्मिंदगी उभर आई, पर आदतवश उन्होंने कोई जवाब नहीं दिया।

शाम को जब रीना ऑफिस से लौटी, उसके हाथों में सब्जियों की थैली थी। उसने मुस्कुराकर वो थैली काजल को थमाई और बोली —
“इसमें तेरी पसंद का उपन्यास रखा है, निकाल लेना।”

काजल ने हँसते हुए कहा —
“थैंक यू दीदी, आपने याद रखा।”

सुधा बुआ ये सब देख रही थीं। उन्होंने रीना को आवाज दी —
“बड़ी बहू, इधर आओ।”

रीना बोली —
“जी बुआ जी?”

बुआ जी बोलीं —
“तुम इतनी मेहनत करती हो, नौकरी भी, घर भी, और ऊपर से ऐसी बेकार चीज़ों पर पैसे खर्च करती हो — किताबें खरीदने का क्या मतलब, वो भी अपनी देवरानी के लिए? घर में बैठी रहती है, वैसे भी फुर्सत में है, क्या करेगी पढ़कर?”

रीना मुस्कुरा दी।
“बुआ जी, घर संभालना कोई आसान काम नहीं होता। सुबह से रात तक काजल एक मशीन की तरह काम करती है। चार बच्चों का टिफिन, मम्मी-पापा की दवाइयाँ, सबकी पसंद का नाश्ता, दोपहर का खाना, फिर बच्चों की पढ़ाई — ये सब बिना किसी शिकायत के करती है। अगर वो न होती, तो मैं ऑफिस में चैन से काम नहीं कर पाती। मेरा ध्यान बार-बार घर पर ही अटकता। पर जब मुझे पता होता है कि काजल घर पर है, तो मैं निश्चिंत होकर अपना सर्वश्रेष्ठ दे पाती हूँ।”

रीना ने आगे कहा —
“काजल को पढ़ने का बहुत शौक है, पर वक्त नहीं मिलता। जब भी मैं किताब खरीदती हूँ, तो सोचती हूँ कि अगर उसके मन की बात मैं पूरी नहीं कर पाई, तो बहन कहलाने का हक ही क्या?”

इतना कहकर रीना मुस्कुराती हुई अपने कमरे में चली गई।

पूजा कर रही सास, लता देवी, ये सारी बातें सुन रही थीं। उन्होंने धीरे-धीरे पूजा खत्म की और बुआ जी के पास आकर बोलीं —
“जीजी, मेरे घर की असली नींव यही दोनों बहुएँ हैं। एक घर को बाहर की दुनिया से जोड़ती है, तो दूसरी घर को अंदर से थामे रहती है। दोनों अगर साथ न हों, तो यह घर टिक नहीं सकता। मैं तो कहती हूँ, जो घर में एक-दूसरे की कद्र करते हैं, वहाँ सुख अपने आप टिक जाता है।”

सुधा बुआ चुप थीं — पर इस बार उनकी चुप्पी में सोच थी, ताने नहीं।

रात को जब सब डिनर पर बैठे, रीना और काजल दोनों साथ रसोई में थीं। एक रोटी बेल रही थी, दूसरी सेक रही थी। बच्चों की हँसी, बड़ों की बातें और सास की मुस्कान — घर का हर कोना अपनापन बिखेर रहा था।

सुधा बुआ ने पहली बार दोनों को गौर से देखा —
रीना के माथे पर हल्की पसीने की बूंदें थीं, और काजल के चेहरे पर सुकून की झलक। बुआ जी ने मन ही मन कहा,
“सच में, ये दोनों ही तो इस घर की असली ताकत हैं।”

शिक्षा:

घर की मजबूती दीवारों या सजावट से नहीं, रिश्तों की समझ और एक-दूसरे के प्रति सम्मान से बनती है।
अगर बहुएँ एक-दूसरे की प्रतिस्पर्धी नहीं, बल्कि सहचरी बन जाएँ, तो घर नर्क नहीं — स्वर्ग बन जाता है।
हर रिश्ता तभी फलता-फूलता है जब उसमें “मैं” नहीं, “हम” की भावना होती है।
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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।

एक राजा अपनी प्रजा का भरपूर ख्याल रखता था. राज्य में अचानक चोरी की शिकायतें बहुत आने लगीं. कोशिश करने से भी चोर पकड़ा नहीं गया.

हारकर राजा ने ढींढोरा पिटवा दिया कि जो चोरी करते पकडा जाएगा उसे मृत्युदंड दिया जाएगा. सभी स्थानों पर सैनिक तैनात कर दिए गए. घोषणा के बाद तीन-चार दिनों तक चोरी की कोई शिकायत नही आई.

उस राज्य में एक चोर था जिसे चोरी के सिवा कोई काम आता ही नहीं था. उसने सोचा मेरा तो काम ही चोरी करना है. मैं अगर ऐसे डरता रहा तो भूखा मर जाउंगा. चोरी करते पकडा गया तो भी मरुंगा, भूखे मरने से बेहतर है चोरी की जाए.

वह उस रात को एक घर में चोरी करने घुसा. घर के लोग जाग गए. शोर मचाने लगे तो चोर भागा. पहरे पर तैनात सैनिकों ने उसका पीछा किया. चोर जान बचाने के लिए नगर के बाहर भागा.

उसने मुडके देखा तो पाया कि कई सैनिक उसका पीछा कर रहे हैं. उन सबको चमका देकर भाग पाना संभव नहीं होगा. भागने से तो जान नहीं बचने वाली, युक्ति सोचनी होगी.

चोर नगर से बाहर एक तालाब किनारे पहुंचा. सारे कपडे उतारकर तालाब में फेंक दिया और अंधेरे का फायदा उठाकर एक बरगद के पेड के नीचे पहुंचा.

बरगद पर बगुलों का वास था. बरगद की जड़ों के पास बगुलों की बीट पड़ी थी. चोर ने बीट उठाकर उसका तिलक लगा लिया और आंख मूंदकर ऐसे स्वांग करने बैठा जैसे साधना में लीन हो.

खोजते-खोजते थोडी देर मे सैनिक भी वहां पहुंच गए पर उनको चोर कहीं नजर नहीं आ रहा था. खोजते खोजते उजाला हो रहा था ओर उनकी नजर बाबा बने चोर पर पडी.

सैनिकों ने पूछा- बाबा इधर किसी को आते देखा है. पर ढोंगी बाबा तो समाधि लगाए बैठा था. वह जानता था कि बोलूंगा तो पकडा जाउंगा सो मौनी बाबा बन गया और समाधि का स्वांग करता रहा.

सैनिकों को कुछ शंका तो हुई पर क्या करें. कही सही में कोई संत निकला तो ? आखिरकार उन्होंने छुपकर उसपर नजर रखना जारी रखा. यह बात चोर भांप गया. जान बचाने के लिए वह भी चुपचाप बैठा रहा.

एक दिन, दो दिन, तीन दिन बीत गए बाबा बैठा रहा. नगर में चर्चा शुरू हो गई की कोई सिद्ध संत पता नहीं कितने समय से बिना खाए-पीए समाधि लगाए बैठै हैं. सैनिकों को तो उनके अचानक दर्शऩ हुए हैं.

नगर से लोग उस बाबा के दर्शन को पहुंचने लगे. भक्तों की अच्छी खासी भीड़ जमा होने लगी. राजा तक यह बात पहुंच गई. राजा स्वयं दर्शन करने पहुंचे. राजा ने विनती की आप नगर मे पधारें और हमें सेवा का सौभाग्य दें.

चोर ने सोचा बचने का यही मौका है. वह राजकीय अतिथि बनने को तैयार हो गया. सब लोग जयघोष करते हुए नगर में ले जाकर उसकी सेवा सत्कार करने लगे.

लोगों का प्रेम और श्रद्धा भाव देखकर ढोंगी का मन परिवर्तित हुआ. उसे आभास हुआ कि यदि नकली में इतना मान-संम्मान है तो सही में संत होने पर कितना सम्मान होगा. उसका मन पूरी तरह परिवर्तित हो गया और चोरी त्यागकर संन्यासी हो गया.

शिक्षा
संगति, परिवेश और भाव इंसान में अभूतपूर्व बदलाव ला सकता है. रत्नाकर डाकू को गुरू मिल गए तो प्रेरणा मिली और वह आदिकवि हो गए. असंत भी संत बन सकता है, यदि उसे राह दिखाने वाला मिल जाए.

अपनी संगति को शुद्ध रखिए, विकारों का स्वतः पलायन आरंभ हो जाएगा..!!

सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।
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एक छोटे से गाँव में एक व्यक्ति रहता था — नाम था शंभू। वह दिखने में तो बहुत साधारण था, पर उसका अभिमान आसमान छूता था। गाँव में अगर कोई भूखा होता, तो वह कहता – “मुझे क्या लेना? हर कोई अपने कर्मों का फल भोगे।”
वह अपने कर्मों को भी हल्के में लेता — झूठ बोलना, दूसरों का हक मारना, और जरूरतमंद की मदद न करना उसकी आदत बन चुकी थी।

एक दिन गाँव में एक वृद्ध साधु आया। उसने सबको कर्म का महत्व समझाया और कहा —
“कर्म बूमरैंग की तरह हैं बेटा, जो जैसा करेगा, वैसा पाएगा। चाहे आज नहीं, कल सही।”

शंभू ने मज़ाक उड़ाते हुए कहा —
“महाराज, अगर सच में कर्म लौटते हैं तो मुझे अभी क्यों नहीं सज़ा मिली?”
साधु मुस्कुराया, “बीज बोया है, फल आने दो।”

साल बीतते गए। शंभू का व्यवसाय बढ़ा, धन-वैभव खूब मिला, पर उसका मन और निर्दयी होता गया।
वह गरीबों का मज़ाक उड़ाता, अपने माता-पिता को वृद्धाश्रम भेज देता और मंदिर जाते हुए भी सिर्फ नाम का माथा टेकता।

एक दिन अचानक उसे अजीब बीमारी हो गई। डॉक्टरों ने कहा — “इसका इलाज नहीं।”
दिन-रात वह बिस्तर पर तड़पता, पर कोई उसके पास न आता। जिन लोगों की मदद न की थी, वे अब उससे नज़रें चुरा लेते।
एक दिन वही साधु फिर आया। उसने कहा —
“याद है शंभू, तुमने कहा था — कर्म मुझे क्यों नहीं पकड़ते? अब पकड़ चुके हैं। जिस दर्द की अनदेखी तुमने दूसरों की की थी, वही दर्द अब तुम्हारे जीवन में उतर आया है।”

शंभू रो पड़ा। बोला, “अब क्या करूँ महाराज?”
साधु ने कहा, “अभी भी देर नहीं हुई। भगवान से क्षमा मांगो, सेवा करो, पश्चाताप ही मुक्ति का मार्ग है।”

शंभू ने शेष जीवन गरीबों की सेवा में लगा दिया। उसके कर्मों ने धीरे-धीरे उसे शांति दी।
मृत्यु के समय वह मुस्कुराया —
“सच कहा था महाराज… कर्म कभी पीछा नहीं छोड़ते, पर सच्चे कर्म उन्हें भी माफ कर सकते हैं।”

शिक्षा:
मनुष्य योनि में किया गया हर कर्म — चाहे छोटा या बड़ा — लौटकर अवश्य आता है।
इसलिए कहा गया है —
“सोच समझकर कर्म कीजिए,
क्योंकि कर्म ही भाग्य का लेख है।”
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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।

एक संत ने किसान को समझाया, ‘जीवन में हमें कई तरह के लालच मिलते हैं, कुछ लोग रास्ता भी रोकते हैं, अगर हम रुक जाएंगे तो असफलता ही मिलेगी’

सफलता उन्हीं लोगों को मिलती है जो बिना रुके आगे बढ़ते रहते हैं और किसी तरह के लालच और प्रलोभन में नहीं उलझते हैं। इस संबंध में एक लोक कथा के अनुसार पुराने समय में एक संत के पास गरीब किसान पहुंचा। किसान ने कहा कि मेरे जीवन में कई तरह की परेशानियां चल रही हैं। मैंने जो लक्ष्य बना रखा है, वहां तक पहुंच नहीं पा रहा हूं। मैं इधर-उधर के कामों में उलझ जाता हूं और सब काम बिगड़ जाते हैं।

संत ने उससे कहा कि मैं तुम्हारे घर आकर तुम्हें कोई रास्ता बताता हूं, जिससे तुम्हारी ये समस्याएं दूर हो सकती हैं। किसान अपने घर लौट आया। अगले दिन संत उस किसान के घर पहुंचे। उस समय किसान घर पर नहीं था।

किसान की पत्नी ने संत का आदर-सत्कार किया और उन्हें बैठने के लिए उचित स्थान दिया। महिला ने अपने पति को बुलाने के लिए बेटे को खेत भेजा। कुछ ही देर में किसान अपने घर पहुंच गया। उसके साथ एक कुत्ता भी था जो जोर-जोर से हांफ रहा था।

संत ने किसान से पूछा कि क्या तुम्हारा खेत बहुत दूर है?

किसान ने कहा कि नहीं, मेरा खेत तो यहीं पास में ही है। आपको ऐसा क्यों लग रहा है

संत ने कहा कि मुझे ये देखकर आश्चर्य हो रहा है कि तुम और तुम्हारा कुत्ता दोनों साथ-साथ आए, लेकिन तुम्हारे चेहरे पर बिल्कुल भी थकान नहीं है, जबकि तुम्हारा कुत्ता बुरी तरह से हांफ रहा है।

किसान बोला कि मैं और ये कुत्ता दोनों एक ही रास्ते से घर आए हैं। मेरा खेत भी पास ही है। मेरा कुत्ता थक गया है। इसकी एक वजह है। मैं सीधे रास्ते से चलकर घर आया हूं, लेकिन ये कुत्ता आस-पास के दूसरों कुत्तों को देखकर उनको भगाने के लिए दौड़ता-भौंकता हुआ आया है। ऐसा ये बार-बार कर रहा था। यही कारण है कि घर आते-आते ये बहुत ज्यादा थक गया है।

संत ने किसान से कहा कि सही बात है। ठीक इसी तरह हमारे साथ भी होता है। हम किसी काम को पूरा करने लगे रहते हैं, तब हमारे सामने कई तरह की रुकावटें आती हैं। हमारा बुरी आदतें हमें काम को पूरा करने से रोकती हैं। कई तरह के लालच मिलते हैं। अगर हम अपना काम छोड़कर इन बातों में उलझ जाते हैं तो लक्ष्य अधूरा ही रह जाता है। हमें सफलता नहीं मिल पाती है।

संत ने आगे कहा कि अगर तुम किसी लक्ष्य को पूरा करना चाहते हो तो तुम्हें सिर्फ अपने काम पर ध्यान देना चाहिए। दूसरी बातों में समय बर्बाद न करें, सिर्फ लक्ष्य पर ध्यान लगाओगे,जल्दी ही वहां तक पहुंच जाओगे..!!
🙏🏼🙏🏾🙏जय श्री कृष्ण🙏🏿🙏🏽🙏🏻

शाम का समय था। सूरज पश्चिम में ढल चुका था और जोधपुर की हवाएँ हल्की ठंडक घोल रही थीं। मेहर कॉलोनी की वह तंग गली आम दिनों की तरह शांत नहीं थी। लोग अपने घरों के बाहर खड़े थे, चेहरे पर चिंता थी और आँखों में सवाल। मोहल्ले में एक नवजात बच्चे के साथ हुई दुखद घटना की खबर ने सभी को भीतर तक हिला दिया था।

उस घर में जहाँ अभी कुछ ही दिनों पहले खुशियों की रोशनी फैली थी, आज मातम पसरा था। विनती और पुनीत के घर भांजे का जन्म हुआ था। 22 दिन का वह मासूम लड़का परिवार के लिए उम्मीद और भविष्य का प्रतीक था। लेकिन किसे पता था कि ईर्ष्या, तनाव और भीतर जमा कड़वाहट कैसे किसी का जीवन उलट सकती है।

विनती की मासियों का परिवार बड़ा था। एकल परिवार में रहने की आदत के कारण नई बहुएँ आपस में आसानी से तालमेल नहीं बिठा पा रही थीं। घर में छोटी-छोटी बातों को लेकर तकरार होती थी—कभी रसोई को लेकर, कभी जिम्मेदारियों को लेकर, और कभी-कभी बस इसलिए कि कोई किसी से ज्यादा सुना जाता है।

इन सबके बीच विनती का नया बच्चा पूरे परिवार की नज़रों का केंद्र बना हुआ था। लोगों की बधाई, रिश्तेदारों का आना-जाना—इन सबने माहौल को और भी संवेदनशील बना दिया था। पर किसी को यह नहीं पता था कि भीतर-ही-भीतर कुछ लोगों में मनोभाव बदल रहे हैं।

उस शनिवार का दिन बाकी दिनों जैसा ही शुरू हुआ था। विनती बच्चे को दुलार रही थी, फिर वह उसे अपनी देवरानी के कमरे में ले गई, जहाँ बाकी महिलाएँ बैठी थीं। बातचीत साधारण थी, लेकिन माहौल में असहजता थी—जैसे कुछ लोग मन से मुस्कुरा नहीं पा रहे हों।

उसी दौरान पुनीत काम से बाहर गया हुआ था। घर की महिलाएँ आपस में घरेलू काम बाँटने को लेकर बहस कर रही थीं। बहस छोटी थी, पर धीरे-धीरे गहराती जा रही थी। इसी बहस में किसी मन में पहले से जमा हुआ तनाव अचानक भड़क उठा।

अचानक, बच्चे की रोने की आवाज धीमी पड़ गई। जब विनती ने अपने बच्चे को गोद में लिया, तो उसे कुछ असामान्य लगा। बच्चा सामान्य नहीं था। उसकी साँसें धीमी थीं और उसका शरीर ढीला था।

विनती की चीख से पूरा मोहल्ला दहल गया। लोग भागते हुए घर में आए। घटनाक्रम को समझने में किसी को कुछ समय लगा, लेकिन सब डर और सदमे में थे। बच्चे को तुरंत अस्पताल ले जाया गया, लेकिन डॉक्टरों ने उसे बचाने में असमर्थता जताई।

पुलिस को सूचना दी गई। पूछताछ शुरू हुई। शुरू में सभी महिलाएँ एक-दूसरे पर आरोप लगाने लगीं। लेकिन धीरे-धीरे बात स्पष्ट होने लगी—घर की कुछ महिलाओं में लम्बे समय से मनमुटाव था। किसी को लग रहा था कि नए बच्चे के आने से उनकी अहमियत कम हो गई है। किसी को ऐसा लगता था कि उनके अपने बच्चों को उतना प्यार नहीं मिलता।

ऐसे भाव, जो सामान्य बातचीत से हल हो सकते थे, गलत दिशा में मुड़ गए थे। पुलिस ने संयम से पूछताछ की, और आखिरकार सच्चाई सामने आ गई। एक महिला ने तनाव में आकर बच्चे को गलत तरीके से संभाला था—और यह लापरवाही धीरे-धीरे एक दुखद परिणाम में बदल गई।

पूरे मोहल्ले पर जैसे सन्नाटा छा गया। लोग समझ नहीं पा रहे थे कि एक घर का तनाव इतनी बड़ी त्रासदी में कैसे बदल सकता है। सभी को यह महसूस हुआ कि कभी-कभी भीतर पनपता गुस्सा, ईर्ष्या या दुख किसी को भी गलत दिशा में धकेल सकता है—अगर उसका समय पर समाधान न हो।

विनती और पुनीत का घर अब पहले जैसा नहीं रहा। लेकिन इस घटना ने पूरे इलाके को एक सीख दी—कि परिवार सिर्फ रिश्तों का नाम नहीं, बल्कि एक दूसरे को समझने और सहने का नाम है।

कहानी से सीख

यह कहानी सिर्फ एक दुखद घटना नहीं, बल्कि समाज के लिए चेतावनी है।

* अंदर जमा गुस्सा और ईर्ष्या किसी का जीवन बिगाड़ सकती है।
* परिवार में संवाद जरूरी है—चुप्पी खतरनाक हो सकती है।
* जब भी किसी को मानसिक तनाव हो, उसे सुना जाना जरूरी है।
* और सबसे महत्वपूर्ण—हर बच्चा निर्दोष होता है, उसे सिर्फ प्यार और सुरक्षा मिलनी चाहिए।
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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।
🙏 ।।राम_राम।। 🙏

एक छोटे से कस्बे में रामनाथ और सरोज नाम के दंपत्ति रहते थे। दोनों ने अपने जीवन में बहुत संघर्ष देखा था, पर उनके स्वभाव में कभी कठोरता नहीं आई। उनके दो बच्चे थे, और दोनों की परवरिश उन्होंने मेहनत, ईमानदारी और संस्कारों से की थी। जैसे-जैसे समय बीता, उनका बेटा रवि पढ़-लिखकर शहर में नौकर‌ी करने लगा। वहीं उसकी मुलाक़ात हुई नेहा से—साधारण परिवार की, लेकिन दिल से बेहद साफ लड़की। रवि ने नेहा से शादी करने का फैसला किया, पर नेहा को सबसे ज्यादा डर इस बात का था कि वह अपने नए घर में, अपनी नई भूमिका में कैसी रहेगी। उसे लगता था कि सास–ससुर बहुत सख़्त होंगे और उसके हर काम में कमी ढूँढेंगे।

शादी के बाद जब नेहा पहली बार ससुराल पहुँची, तो उसका दिल घबराहट से धड़क रहा था। पर जैसे ही उसने घर में कदम रखा, सरोज ने उसे प्यार से गले लगा लिया और बोलीं, “बेटी, अब यह घर तुम्हारा है। तुम बहू बनकर नहीं, बेटी बनकर रहना।” इन शब्दों की गर्माहट ने उसके मन का आधा बोझ उसी पल हल्का कर दिया।

रामनाथ भी उसे देखकर मुस्कुराए और बोले, “नेहा, इस घर में गलती करने की पूरी आज़ादी है। जो गलती न करे, वह सीख भी कैसे पाएगा?” नेहा के चेहरे पर अनायास मुस्कान आ गयी। इतने अपनापन की उसने उम्मीद नहीं की थी।

धीरे-धीरे घर का माहौल उसकी सोच से बिलकुल उल्टा निकला। सरोज उसे रसोई में मदद करतीं, नई चीजें सिखातीं, और जब नेहा किसी काम में असफल हो जाती, तो डाँटने की जगह हौसला बढ़ातीं। “अरे, मैंने तुम्हारी उम्र में इससे बड़े-बड़े कांड किए हैं,” कहकर वह हंस देतीं, और नेहा भी खुलकर हँस पड़ती।

रामनाथ उसके सपनों को उतना ही महत्व देते थे जितना अपनी बेटी के सपनों को देते थे। नेहा नौकरी करना चाहती थी, पर उसे लगता था कि घर की जिम्मेदारियों में यह संभव नहीं होगा। एक दिन जब उसने हिचकिचाते हुए बात छेड़ी, तो रामनाथ ने कहा, “हमारा घर तो तुम्हारे साथ चलता ही रहेगा, लेकिन तुम्हारे सपने अगर अधूरे रह गए, तो मन में हमेशा कसक रहेगी। जाओ, इंटरव्यू दो। हम हैं ना घर संभालने के लिए।”

सरोज ने उसका बैग तैयार करवाया और कहा, “बस यह याद रखना—घर के लोग हमेशा तुम्हारे पीछे खड़े हैं।”

नेहा का आत्मविश्वास बढ़ गया। उसने इंटरव्यू दिया और नौकरी मिल गई। जब वह घर लौटी, तो सबसे पहले सरोज और रामनाथ ही खुशी से नाचे। सरोज ने पड़ोस में मिठाई बाँटी और गर्व से बोलीं, “मेरी बेटी को नौकरी मिल गई!”

धीरे-धीरे नेहा ने महसूस किया कि सास–ससुर केवल घर का बड़ा सहारा नहीं होते, बल्कि वे आपके पंख भी बन सकते हैं, जो आपको उड़ना सिखाते हैं। समय बीतता गया, घर में हँसी–खुशी बढ़ती गई। किसी भी त्योहार या मुश्किल में वे सब एक साथ खड़े रहते।

एक दिन नेहा ने अपने दोस्तों से कहा, “लोग कहते हैं सास–ससुर से तालमेल बिठाना मुश्किल होता है, लेकिन मेरे सास–ससुर मेरे जीवन की सबसे बड़ी प्रेरणा हैं। उन्होंने मुझे बहू नहीं, बेटी समझा—और यही मेरे जीवन का सबसे बड़ा सौभाग्य है।”

रामनाथ और सरोज ने हमेशा एक बात समझी थी—परिवार प्यार से चलता है, अधिकार से नहीं। उन्होंने नेहा को सम्मान दिया, उसकी इच्छाओं को स्थान दिया, और बदले में नेहा ने घर को अपने मन से सँवारा।

इस तरह वह घर एक ऐसी कहानी बन गया, जहाँ रिश्ते खून से नहीं, बल्कि प्यार और सम्मान से बनते थे—जहाँ सास–ससुर परंपरा नहीं, प्रेरणा बनकर जीते थे।

सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।
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शहर के कोने में एक पुराना घर था, जिसमें रामलाल और उनकी पत्नी सीता रहते थे। बरसों की मेहनत से उन्होंने वह घर बनाया था — ईंट-ईंट जोड़कर, जैसे किसी ने सपनों का महल गढ़ा हो। तीन बेटे थे — सब पढ़े-लिखे, नौकरी वाले, और अब अपनी-अपनी दुनिया में व्यस्त।

एक दिन बड़े बेटे ने कहा,
“पिताजी, अब यह घर पुराना हो गया है। इसे बेच देते हैं, नया फ्लैट लेंगे — शहर के बीचों-बीच।”
रामलाल मुस्कुराए — “बेटा, यह घर पुराना सही, पर इसमें हमारी यादें बसती हैं।”

पर दुनिया की रफ्तार भावनाओं से तेज़ थी। कुछ ही महीनों में घर बिक गया। नए फ्लैट में जगह तो थी, पर मन कहीं नहीं ठहरता था। धीरे-धीरे तीनों बेटों की बातें बदलने लगीं —
“माँ-पिताजी को अब आराम चाहिए, गाँव भेज दो। वहाँ हवा भी अच्छी है, खर्च भी कम होगा।”

एक शाम, बारिश हो रही थी। बेटों ने सामान बाँधकर कहा —
“गाँव में सब इंतज़ाम कर दिया है, वहाँ आराम से रहिएगा।”
सीता की आँखों से आँसू झरते रहे, पर रामलाल बस एक वाक्य बोले —
“जिस घर को हमने अपने बच्चों के लिए बनाया था, आज वही घर हमारे बिना है।”

गाँव में बस एक टूटी झोपड़ी मिली, और कुछ पुराने कपड़े। कोई पूछने वाला नहीं, कोई देखने वाला नहीं। धीरे-धीरे सीता बीमार पड़ गईं। आख़िरी साँसों में उन्होंने रामलाल से कहा —
“शायद हमारे बच्चों को अभी ‘घर’ का मतलब नहीं समझ आया।”

महीनों बाद, शहर में खबर आई — “गाँव में एक बुज़ुर्ग दंपती ठंड से मर गए।”
तीनों बेटे कुछ देर मौन रहे, फिर अपने-अपने फोन में खो गए।

और उस रात, जब वे अपने फ्लैट की छत के नीचे सो रहे थे —
उनके सपनों में वही पुराना घर आया — जिसमें माँ रसोई में और पिता आँगन में बैठे मुस्कुरा रहे थे…

शिक्षा:

माता-पिता को घर से निकालना, अपने भाग्य से सुख को निकालने जैसा है।
घर दीवारों से नहीं, माँ-बाप के आशीर्वाद से बनता है।
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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।

शाम का समय था।
विशाल सभा-मंडप में हजारों लोग जमा थे।
मंच पर दीये जल रहे थे, धूप की महक हवा में फैल रही थी।
तभी एक युवक अचानक खड़ा हुआ। उसकी आँखों में जिज्ञासा थी।

युवक (तेज आवाज़ में):
“गुरुदेव! हम सत्य की खोज क्यों करें?
जब संगीत, सिनेमा और मनोरंजन में मज़ा मिलता है तो जीवन को उसी तरह क्यों न बिताएँ…..?”

सभा में हलचल मच गई।

सबकी निगाहें गुरुदेव की ओर मुड़ गईं।

गुरुदेव ने शांत मुस्कान बिखेरी- मानो प्रश्न पहले से ही जानते हों।

गुरुदेव: “बेटा, यह प्रश्न तभी उठता है जब सत्य और आनंद को दो मान लिया जाता है।
लेकिन सत्य ही आनंद है… और आनंद ही सत्य।
जो आनंद तुम्हें बाहर दिखता है, वह केवल—दुख से पलायन है।”

सभा में गहरा मौन था।
गुरुदेव ने हाथ उठाकर एक अद्भुत नाटकीय कथा शुरू की।

बहुत समय पहले एक विलक्षण संगीतज्ञ एक नगर में आया।
उसकी वीणा के स्वर लोगों को पागल कर देते थे।
राजा ने उसे महल में आमंत्रित किया।

संगीतज्ञ ने कहा: “मैं वीणा बजाऊँगा…
यदि किसी श्रोता का सिर हिला- संगीत रोक दूँगा।”
राजा ने कहा: “ठीक है! जो सिर हिलाएगा उस सिर को हम तलवार से अलग कर देंगे!”
यह आदेश पूरे नगर में आग की तरह फैल गया।
लोग भय और उत्सुकता से काँप रहे थे। रात आई। महल में हजारों दीपक जल उठे।
नंगी तलवारें लिए सिपाही मंच के किनारे खड़े हो गए थे।
महल के द्वार बंद कर दिए गए!
अब कोई भाग भी नहीं सकता था।

सिर्फ दो-तीन सौ साहसी लोग आए।
वे मौत के डर से स्वयं को मूर्ति की तरह जकड़े हुए थे।

संगीतज्ञ मंच पर आया।
उसकी आँखें शांत थीं- जैसे किसी और ही लोक से उतरा हो।

अगले ही क्षण…..!
वीणा के पहले सुर ने पूरे वातावरण को झकझोर दिया।
जैसे हवा में जादू हो गया हो।
समय गुजरता गया!
एक घंटा, दो घंटे, आधी रात…
अचानक सिपाहियों की आँखें फैल गईं!
कुछ सिर हल्के-हल्के हिलने लगे थे!
पहले दस…
फिर बीस…
फिर पचास लोगों की गर्दनें धीरे-धीरे झूमने लगीं।
सैनिकों ने उन्हें पकड़ लिया।

राजा ने क्रोध से कहा:
“पागलों! अपनी गर्दनें क्यों हिलाईं? मरना चाहते थे?”

वे काँपते हुए बोले:
“महाराज… हमने सिर हिलाया ही नहीं…
सिर स्वयं हिलने लग गए…
जब तक होश था, हम स्थिर बैठे थे…
लेकिन संगीत जैसे-जैसे गहरा हुआ कि हम तो जैसे गायब ही हो गए!
हम मौजूद ही नहीं रहे…
फिर सिर हिलने का दोष किस पर लगे?”
संगीतज्ञ हँस पड़ा!
“महाराज, यही लोग मेरे संगीत के अधिकारी हैं!
क्योंकि ये होश खो बैठे थे।”
महल स्तब्ध था।
इतना कह कर गुरुदेव ने कथा यहीं रोक दी। पूरी सभा उनकी ओर आश्चर्य से देखने लगी –
जैसे कोई रहस्य पर से पर्दा हटने वाला हो।

गुरुदेव: “बच्चे, यह बेहोशी आनंद नहीं है।
दुख वहीं था- बस उसे देखने वाला सो गया।
संगीत, सिनेमा, नशा- सब यही तो करते हैं।
दुख मिटता नहीं- केवल विस्मरण हो जाता है।”
युवक अब गंभीर हो गया ।

गुरुदेव (स्वर को ऊँचा करते हुए):
“सत्य की खोज इसलिए आवश्यक है-
क्योंकि वही भीतर दीपक जलाता है।
और दीपक जलते ही अंधेरा अपने आप मिट जाता है। दुख को भूलकर नहीं: दुख को जड़ से मिटाकर ही आनंद मिलता है।”

सभा में बैठे लोग अवाक् थे।
मानो हर शब्द उनके हृदय का ताला तोड़ रहा हो।

गुरुदेव उठे और कहा:
“सत्य की खोज करो-
क्योंकि सत्य आने पर
भीतर से आनंद का झरना फूट पड़ता है।

जिसने भीतर आनंद पा लिया!
उसे बाहर सुख ढूँढने की कोई जरूरत नहीं रहती।
जो भीतर दुखी है, वह बाहर भागता है।
जो भीतर संतुष्ट है, वह बाहर शांत हो जाता है।

और जो सत्य को पा लेता है-
उसके जीवन में हर क्षण दिव्य संगीत बजने लगता है।”

हर चेहरा उज्ज्वल था!
हर मन भीतर से हिला हुआ था ।

और युवक-
गुरुदेव के चरणों में आ गिरा।
“गुरुदेव… अब समझ गया—
सत्य की खोज ही जीवन का सबसे बड़ा उद्देश्य है।”

सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।
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संध्या की लाली आकाश में घुल रही थी। एक पुराना हवेली-सा घर पहाड़ी के छोर पर खामोश खड़ा था। बरामदे में दीपक जलाने की कोशिश में नयन के हाथ काँप रहे थे। हवा बार-बार लौ को बुझा देती थी — जैसे भीतर की उम्मीद भी हर झोंके के साथ बुझती जा रही हो।

नयन के होंठों से अनजाने में वही शब्द फिसले —
“पंहुचती होंगी सिसकियां, आँसुओं में लिपट कर…”
उसकी आँखें दूर क्षितिज में टिक गईं। वहाँ, जहाँ कभी सिया उसके साथ सूर्यास्त देखा करती थी। हर शाम वे कहते थे — “देखो, दिन कैसे रात की बाहों में समा जाता है… जैसे हमारी बातें समय में।”

पर आज वही सांझ उसके लिए तन्हाई बन गई थी।
दो साल पहले, सिया अचानक शहर छोड़ गई थी। नयन ने बहुत ढूंढा, हर गली, हर डाकघर, हर ट्रेन स्टेशन… लेकिन वो लौटकर कभी नहीं आई।

आज की रात कुछ अलग थी। हवाओं में वही खुशबू थी — सिया के पसंदीदा रजनीगंधा फूलों की। नयन के मन ने फिर पुकारा —
“उतर आ वापस ज़मीं पर, ओ सांझ, तुझमें ही ये भोर समाया है…”

जैसे कोई सुन रहा हो।
बरामदे की सीढ़ियों पर हल्के कदमों की आहट गूँजी।
नयन ने पलटकर देखा — वही सलवार, वही चुन्नी, वही नज़ाकत — सिया खड़ी थी। पर उसके चेहरे पर थकान थी, जैसे सदियों की दूरी तय करके लौटी हो।

“नयन…” उसने धीमे से कहा।
वो शब्द हवा में ठहर गए।
नयन की आँखों में नमी थी, पर होंठों पर मुस्कान भी —
“मुझे पता था… मेरी सिसकियाँ पहुँचे बिना तू चैन से नहीं रह सकती।”

सिया मुस्कुरा दी, और बरामदे की चौखट पर दीपक आखिरकार जल उठा।
अंधेरा पीछे हट गया —
सांझ में फिर से भोर उतर आई थी।

शिक्षा:
कभी-कभी हमारा दुख, हमारी पुकार समय को भी पिघला देती है।
अगर प्रेम सच्चा हो, तो वह लौटकर ज़रूर आता है —
भले ही सांझ बनकर, या भोर बनकर… मगर आता है।
●▬▬๑۩ ✍ ۩๑▬▬●
सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।

.वृंदावन के पास एक गाँव में भोली-भाली माई ‘पंजीरी’ रहती थी।.
दूध बेच कर वह अपनी जीवन नैया चलाती थी। वह मदनमोहन जी की अनन्य भक्त थी।

ठाकुर मदनमोहन लाल भी उससे बहुत प्रसन्न रहते थे। वे उसे स्वप्न में दर्शन देते और उससे कभी कुछ खाने को माँगते, कभी कुछ। पंजीरी उसी दिन ही उन्हें वह चीज बनाकर भेंट करती,
.
वह उनकी दूध की सेवा नित्य करती थी, सबसे पहले उनके लिए प्रसाद निकालती, रोज उनके दर्शन करने जाती और दूध दे आती।
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लेकिन गरीब पंजीरी को चढ़ावे के बाद बचे दूध से इतने पैसे भी नहीं मिलते थे कि दो वक्त का खाना भी खा पाये, अतः कभी कभी मंदिर जाते समय यमुना जी से थोड़ा सा जल दूध में मिला लेती।
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फिर लौटकर अपने प्रभु की अराधना में मस्त होकर बाकी समय अपनी कुटिया में बाल गोपाल के भजन कीर्तन करके बिताती।
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कृष्ण कन्हैया तो अपने भक्तों की टोह में रहते ही हैं, नित नई लीला करते हैं।
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एक दिन पंजीरी के सुंदर जीवन क्रम में भी रोड़ा आ गया। जल के साथ-साथ एक छोटी सी मछली भी दूध में आ गई और मदनमोहन जी के चढ़ावे में चली गई।

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दूसरे प्रहर जो आँख लगी कि ठाकुर श्री मदन मोहन लाल जी को सम्मुख खड़ा पाया।
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ठाकुर जी बोले, मैया, मुझे भूखा मारेगी क्या ? गोसाईं की बात का बुरा मान कर रूठ गयी।
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खुद पेट में अन्न का एक दाना तक न डाला और मुझे दूध पीने को कह रही है।

मैंने तो आज तेरे घर आकर दूध पी लिया अब तू भी अपना व्रत तोड़ कर कुछ खा पी ले और देख,
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मैं रोज़ तेरे दूध की प्रतीक्षा में व्याकुल रहता हूँ, मुझे उसी से तृप्ति मिलती है। अपना नियम कभी मत तोड़ना।
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गोसाईं भी अब तेरे को कुछ ना कहेंगे। दूध में पानी मिलाती हो, तो क्या हुआ ? उससे तो दूध जल्दी हज़म हो जाता है। अब उठो और भोजन करो।
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पंजीरी हड़बड़ाकर उठी, देखा कि बालक तो कुटिया में कहीं नहीं था।
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सचमुच लाला ही कुटिया में पधारे थे। पंजीरी का रोम-रोम हर्षोल्लास का सागर बन गया।
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झटपट दो टिक्कड़ बनाए और मदन मोहन को भोग लगाकर आनंदपूर्वक खाने लगी। उसकी आंखों से अश्रुधारा बह रही थी।

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थोड़ी देर में सवेरा हो गया पंजीरी ने देखा कि ठाकुर जी उसकी ओढ़नी ले गये हैं और अपना पीतांबर कुटिया में ही छोड़ गए हैं।
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इधर मंदिर के पट खुलते ही गोसाईं ने ठाकुर जी को देखा तो पाया की प्रभु एक फटी पुरानी सी ओढ़नी ओढ़े आनंद के सागर में डूबे हैं।
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उसने सोचा कि प्रभु ने अवश्य फिर कोई लीला की है, लेकिन इसका रहस्य उसकी समझ से परे था।
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लीला-उद्घाटन के लिए पंजीरी दूध और ठाकुर जी का पीताम्बर लेकर मंदिर के द्वार पर पहुँची और बोली,
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गुसाईं जी, देखो तो लाला को, पीतांबर मेरे घर छोड़ आये और मेरी फटी ओढ़नी ले आये।
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कल सवेरे आपने मुझे भगा दिया था, लेकिन भूखा प्यासा मेरा लाला दूध के लिये मेरी कुटिया पर आ गया।
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गोसाईं जी पंजीरी के सामने बैठ गए।
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भक्त और भगवान के बीच मैंने क्या कर डाला, भक्ति बंधन को ठेस पहुंचा कर मैंने कितना बड़ा अपराध कर डाला, माई, मुझे क्षमा कर द

पंजीरी बोली.. गुसाई जी, देखी तुमने लाला की चतुराई, अपना पीतांबर मेरी कुटिया मे जानबूझकर छोड़ दिया और मेरी फटी-चिथड़ी ओढ़नी उठा लाये।
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भक्तों के सम्मान की रक्षा करना तो इनकी पुरानी आदत है।”
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ठाकुर धीरे-धीरे मुस्कुरा रहे थे, अरे मैया तू क्या जाने कि तेरे प्रेम से भरी ओढ़नी ओड़ने में जो सुख है वो पीतांबर में कहाँ..!!

‼️ प्रेम से कहो श्री राधे‼️

‼️वृन्दावन बिहारीलाल की जय‼️

रात का सन्नाटा पसरा हुआ था। खाने की थाली अभी भी अधूरी पड़ी थी। पति-पत्नी के बीच हुए झगड़े की गूंज दीवारों से टकरा रही थी।
पति तो ग़ुस्से में बच्चों को सुलाकर लेट गया, लेकिन पत्नी के मन में तूफ़ान उठ रहा था।
उसका मन कह रहा था — “अब बहुत हुआ… मैं यहाँ और नहीं रह सकती।”

वह धीरे से उठी, दरवाज़ा खोला और चप्पलों की धीमी आवाज़ के साथ घर से निकल पड़ी।

रात के उस सन्नाटे में हवा की ठंडी लहरें उसके चेहरे को छू रही थीं, लेकिन उसके दिल की आग शांत नहीं हो रही थी।
चलते-चलते वह अपने ही मोहल्ले की गलियों में भटकने लगी।

तभी उसे एक घर से किसी महिला की आवाज़ सुनाई दी —
“हे भगवान, आज मेरे बच्चे के लिए कुछ रोटी का इंतज़ाम हो जाए… उसका पेट दो दिन से ठीक से नहीं भरा है।”

पत्नी ठिठककर खड़ी रह गई। उसके दिल में एक अजीब-सी टीस उठी।
थोड़ा आगे बढ़ी, तो दूसरे घर से एक औरत की धीमी प्रार्थना सुनाई दी —
“भगवान, मेरे बेटे को हर मुश्किल से बचा लेना, उसके पास नौकरी नहीं है, पर हिम्मत बहुत है…”

वह चुपचाप सुनती रही।
फिर कुछ कदम और चली तो एक आदमी की झुंझलाती हुई आवाज़ आई —
“सुनो, मकान मालिक को जाकर कहना कि बस कुछ दिन और मोहलत दे दे… रोज़-रोज़ की झंझट अब नहीं झेली जाती।”

पत्नी ने सिर झुका लिया। उसे अपनी अभी-अभी की लड़ाई याद आ गई — केवल इस बात पर कि पति ने महीने के अंत तक नया साड़ी देने से मना कर दिया था।

अब वह गलियों से गुजरती जा रही थी, लेकिन हर मोड़ पर किसी न किसी का दर्द सुनाई दे रहा था।
थोड़ी दूर पर एक बूढ़ी दादी अपने पोते से कह रही थी —
“बेटा, मेरी दवा कब लाएगा?”
पोते ने रोटी का टुकड़ा मुंह में डालते हुए कहा —

“दादी, मेडिकल वाला अब उधार नहीं देता… मेरे पास पैसे नहीं हैं।”

उसकी आँखें भर आईं।
फिर कुछ आगे जाकर उसने देखा — एक औरत अपने दो छोटे बच्चों को थपकियाँ दे रही थी और कह रही थी —
“सो जाओ, पापा खाने को कुछ लेकर आएँगे, तब मैं तुम्हें जगा दूँगी…”

उसने देखा, वो बच्चे भूखे पेट नींद में जाने की कोशिश कर रहे थे।

उसके कदम रुक गए।
अब उसके मन में वही तूफ़ान नहीं था, जो घर से निकलते वक्त था।
उसने सिर उठाया और आसमान की तरफ देखा —
“हर कोई अपने-अपने संघर्षों से लड़ रहा है… पर फिर भी सब मुस्करा रहे हैं…”

धीरे-धीरे वह वापस अपने घर की ओर लौट पड़ी।
जब उसने दरवाज़ा खोला, तो देखा — पति सोफे पर ही लेटा हुआ था, शायद उसका इंतज़ार करते-करते सो गया था।
बच्चे भी अपने कम्बलों में दुबके हुए थे।

उसने पास जाकर बच्चों के सिर पर हाथ फेरा, और फिर पति की ओर देखा।
मन ही मन बोली —
“हाँ, कुछ बातें हमें दुखी कर देती हैं… लेकिन जो हमारे पास है, वो भी किसी की दुआ है।”

उसने चुपचाप पति के कंधे पर एक रजाई डाली और रसोई में जाकर खुद के लिए चाय बनाई।
बाहर वही चाँद मुस्करा रहा था — जैसे कह रहा हो,
संघर्ष ही तो हर मुस्कान की जड़ है।”

सीख:

हर इंसान अपनी ज़िंदगी में किसी न किसी लड़ाई से गुजर रहा है।
हम दूसरों की मुस्कान देखकर उनके जीवन को आसान समझ लेते हैं, लेकिन हर मुस्कान के पीछे एक अधूरा दर्द, एक छिपा संघर्ष होता है।

इसलिए जो हमारे पास है, उसकी कद्र करें, अपने रिश्तों को प्यार से सँवारें और हर परिस्थिति में भगवान का आभार मानें।
यही “जीवन की सच्चाई” है।

एक बहेलिया था। चिड़ियों को जाल में या गोंद लगे बड़े भारी बाँस में फँसा लेना और उन्हें बेच डालना ही उसका काम था। चिड़ियों को बेचकर उसे जो पैसे मिलते थे, उसी से उसका काम चलता था।

एक दिन वह बहेलिया अपनी चद्दर एक पेड़ के नीचे रखकर अपना बड़ा भारी बाँस लिये किसी चिड़िया के पेड़ पर आकर बैठने की राह देखता बैठा था। इतने में एक टिटिहरी चिल्लाती दौड़ी आयी और बहेलिये की चद्दर में छिप गयी।

टिटिहरी ऐसी चिड़िया नहीं होती कि उसे कोई पालने के लिये खरीदे। बहेलिया उठा और उसने सोचा कि अपनी चद्दर में से टिटिहरी भगा देना चाहिये। इसी समय वहाँ ऊपर उड़ता एक बाज दिखायी पड़ा। बहेलिया समझ गया कि यह बाज टिटहरी को पकड़ कर खा जाने के लिये झपटा होगा, इसी से टिटिहरी डरकर मेरी चद्दर में छिपी है। बहेलिये के मन में टिटिहरी पर दया आ गयी। उसने ढेले मारकर बाज को वहाँ से भगा दिया। बाज के चले जानेपर टिटिहरी चद्दर से निकलकर चली गयी।

कुछ दिनों पीछे बहेलिया बीमार हुआ और मर गया। यमराज के दूत उसे पकड़कर यमपुरी ले गये। यमपुरी में कहीं आग जल रही थी, कहीं चूल्हे पर बड़े भारी कड़ाही में तेल उबल रहा था।पापी लोग आग में भूने जाते थे, तेल में उबाले जाते थे। यमराज के दूत पापियों को कहीं कोड़ों से पिटते थे, कहीं कुल्हाड़ी से काटते थे। और भी भयानक कष्ट पापियों को वहाँ दिया जाता था। बहेलिये के वहाँ जाते ही, वहाँ सैकड़ों, हजारों चिड़ियाँ आ गयीं और वे कहने लगीं– ‘इसने हमें बिना अपराध के फँसाया और बेचा है। हम इसकी आँखें फोड़ देंगी और इसका मांस नोच-नोचकर खाएँगी।’

बेचारा बहेलिया डर के मारे थर-थर काँपने लगा। उसी समय वहाँ एक टिटिहरी आयी। उसने हाथ जोड़कर यमराज से कहा– ‘महाराज! इसने बाज से मेरे प्राण बचाये हैं। इसको आप क्षमा करें।

यमराज बोले– ‘यह बड़ा पापी है। सब चिड़ियाँ इसे नोचेंगी और फिर इसे जलाया जायगा और कुल्हाड़ों से काटा जायगा। लेकिन यह छोटी टिटिहरी इसको बचाने आयी है। इसने एक बार इस चिड़िया पर दया की है। इसलिये इसको अभी संसार में लौटा दो और इसे एक वर्ष जीने दो।’

यमराज के दूत बहेलिये के जीव को लौटा लाये। बहेलिये के घरके लोग उसकी देह को श्मशान ले गये थे और चितापर रखनेवाले थे। वे लोग रो रहे थे। इतने में बहेलिया जी गया। वह बोलने और हिलने लगा। उसके घर के लोग बहुत प्रसन्न हुए और उसके साथ घर लौट आये।

बहेलिये को यमराज की बात याद थी।उसने चिड़िया पकड़ना छोड़ दिया। अपने भाइयों से भी चिड़िया पकड़ने का काम उसने छुड़ा दिया। वह मजदूरी करने लगा। सबेरे और शाम को वह रोज चिड़ियों को थोड़े दाने डालता था। बहुत-सी चिड़ियाँ उसके दाने खा जाया करती थीं। अब रोज वह भगवान् की प्रार्थना करता था और भगवान् का नाम जपता था। इससे बहेलिये के सब पाप कट गये। एक वर्ष बाद जब वह मरा, तब उसे लेने देवताओं का विमान आया और वह स्वर्ग चला गया।

शिक्षा:-
हमें भी किसी भी जीवन को कष्ट नहीं देना चाहिये। सभी जीवों पर दया करनी चाहिये। जो जीवों पर दया करता है, उस पर भगवान् प्रसन्न होते हैं

सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।

एक समय की बात है, जब महिषासुर नामक दैत्य ने अपने बल और अहंकार के मद में तीनों लोकों पर अधिकार कर लिया था। उसके अत्याचारों से धरती, आकाश और पाताल सब त्रस्त थे। स्वर्ग के देवता अपमानित होकर अपने आसनों से हट चुके थे, धर्म क्षीण हो चुका था और संसार में भय का वातावरण था।

तब इन्द्र सहित समस्त देवता ब्रह्मा, विष्णु और महेश के पास पहुँचे और बोले—

हे प्रभो! हमारे बल, हमारे अस्त्र सब व्यर्थ हो गए हैं। अब केवल एक ही आशा है—माता शक्ति की।”

यह सुनकर त्रिदेवों के तेज से एक अद्भुत प्रकाश प्रकट हुआ। उस दिव्य ज्योति से महाशक्ति दुर्गा प्रकट हुईं—सिंह पर आरूढ़, शस्त्रों से सुसज्जित, और मुख पर करुणा तथा तेज का विलक्षण संगम।

देवताओं ने कहा—“माँ! आप ही हमारी रक्षक हैं, आप ही संहारक। हम सबकी शक्तियाँ आपसे ही उत्पन्न हुई हैं।”
देवी ने मुस्कराकर कहा—“देवताओं! जब धर्म संकट में पड़े, तब मैं सदैव तुम्हारे साथ रहूँगी।”

तब देवी ने महिषासुर और उसकी विशाल सेना का सामना किया। युद्ध बारह दिनों तक चला। देवी के खड्ग, त्रिशूल और धनुष की गर्जना से दिशाएँ काँप उठीं। अंततः माँ दुर्गा ने अपने त्रिशूल से महिषासुर का संहार किया। युद्धभूमि में जैसे ही शांति छाई, देवताओं ने नतमस्तक होकर देवी की स्तुति की—

हे जगदम्बे! आप ही लक्ष्मी बनकर पुण्यात्माओं के घरों में रहती हैं, बुद्धि बनकर ज्ञानी पुरुषों के हृदय में विराजती हैं, श्रद्धा बनकर सत्पुरुषों में निवास करती हैं और लज्जा बनकर कुलीनों की शोभा बढ़ाती हैं। आपका तेज, आपका सौंदर्य और आपकी करुणा अपरंपार है।”

उनकी वाणी में गहन भक्ति और कृतज्ञता झलक रही थी। देवी ने प्रसन्न होकर कहा—

देवताओ! जब-जब कोई मनुष्य सच्चे मन से मेरी स्तुति करेगा, मैं उसके भय, दुःख और दरिद्रता को दूर कर दूँगी। जब भी मेरा नाम लिया जाएगा, मैं उसके कल्याण के लिए उपस्थित रहूँगी।”

देवताओं ने हाथ जोड़कर प्रार्थना की माँ! जब-जब संसार पर संकट आए, तब-तब आप अपने भक्तों को दर्शन दें और उनकी रक्षा करें।”

देवी मुस्कुराईं, उनके मुख से मधुर वाणी निकली—“तथास्तु।”
इतना कहकर वे अन्तर्धान हो गईं, पर उनकी कृपा और आशीष तीनों लोकों में व्याप्त रही।

तब से हर युग में जब भी अधर्म बढ़ता है, माँ दुर्गा अपने किसी न किसी रूप में प्रकट होकर धर्म की रक्षा करती हैं और भक्तों को भक्ति की शक्ति का महत्व याद दिलाती हैं।

शिक्षा :

* सच्ची भक्ति वही है, जिसमें अहंकार न हो और श्रद्धा हो।
* जब मनुष्य अपने बल पर गर्व करता है, तो उसका पतन निश्चित होता है; पर जब वह विनम्र होकर ईश्वर को पुकारता है, तो असंभव भी संभव हो जाता है।
* देवी शक्ति केवल संहार की नहीं, बल्कि करुणा, रक्षा और कल्याण की भी प्रतीक हैं।
* जो श्रद्धा और प्रेम से माँ दुर्गा का स्मरण करता है, उसके जीवन से भय, दुख और दुर्भाग्य दूर हो जाते हैं।

जय जय श्री राम 🙏🏻
जय हिन्द 🇮🇳
सदैव प्रसन्न रहिए 🙏🏻
जो प्राप्त है, पर्याप्त है।।

*दो भाई की अनमोल गाथा,,

सेठ धनीराम एक सम्मानित, विचारशील और संपन्न व्यक्ति थे। उनके दो पुत्र थे – मोहन और सोहन। समय के साथ धनीराम वृद्ध हो गए और उन्होंने अपनी संपत्ति का बंटवारा करने का निर्णय लिया।

बँटवारे की प्रक्रिया जैसे ही शुरू हुई, वैसे ही दोनों पुत्रों में विवाद उत्पन्न हो गया। सबसे बड़ा विवाद था – शहर में स्थित एक चार बेडरूम वाले आलीशान घर को लेकर। मोहन और सोहन दोनों ही उस घर को पाना चाहते थे। बात इतनी बिगड़ गई कि एक दिन दोनों आपस में मरने-मारने पर उतारू हो गए।

धनीराम यह दृश्य देखकर जोर से हँस पड़े।

उनकी हँसी देखकर दोनों भाई चौंक गए। लड़ाई भूलकर उन्होंने पूछा – “पिताजी, ऐसी स्थिति में आप हँस क्यों रहे हैं?”

पिता ने गंभीरता से कहा – “तुम दोनों एक छोटे से ज़मीन के टुकड़े के लिए इतना झगड़ रहे हो, चलो मैं तुम्हें एक अनमोल खजाना दिखाता हूँ। लेकिन एक शर्त है – अगर तुम आपस में झगड़े तो मैं बीच रास्ते से ही लौट आऊँगा।”

मोहन और सोहन को खजाने की बात सुनकर लालच हुआ, पर पिता की बात मानकर दोनों ने आपसी प्रेम और समझदारी से यात्रा करने का निर्णय लिया।

तीनों पिता-पुत्र गांव के लिए रवाना हुए। रास्ते में उन्हें एक बस मिली, लेकिन उसमें सिर्फ दो सीटें उपलब्ध थीं। उन्होंने आपस में सीटें बाँटीं – थोड़ी देर मोहन बैठे, फिर थोड़ी देर सोहन। 10 घंटे की यात्रा के बाद वे गांव पहुँचे।

गांव में धनीराम उन्हें एक बड़ी हवेली के पास ले गए। हवेली सुनसान थी, दीवारें झड़ चुकी थीं, और हर कोने में कबूतरों ने घोंसले बना लिए थे। धनीराम उस हवेली को देख रोने लगे।

पुत्रों ने पूछा – “पिताजी, आप क्यों रो रहे हैं?”

धनीराम बोले – “बचपन याद है तुम्हें? यही वह हवेली है जिसके लिए मैंने अपने बड़े भाई से लड़ाई की थी। ये हवेली तो मिल गई, पर मैं अपना भाई हमेशा के लिए खो बैठा। वो दूर देश चला गया और फिर कभी नहीं लौटा। वक्त बदला और एक दिन हमें भी यह हवेली छोड़नी पड़ी।”

फिर उन्होंने पूछा – “बेटा, जिस सीट पर हम बस में बैठे थे, क्या वो सीट हमेशा के लिए हमारी हो गई?”

दोनों पुत्रों ने जवाब दिया – “नहीं पिताजी, बस की यात्रा चलती रहती है। आज हम बैठे थे, कल कोई और बैठेगा।”

धनीराम मुस्कुराए और बोले – “यही मैं समझाना चाहता हूँ। ये घर, जमीन-जायदाद, दौलत – ये सब बस थोड़ी देर के लिए हमारे पास है। इससे पहले कोई और था, आज हम हैं, कल कोई और होगा। जैसे बस की सीट पर सवारियाँ बदलती रहती हैं, वैसे ही जीवन की यह दौलत भी बदलती रहती है।”

“बेटा, ध्यान रखना – इस थोड़ी सी देर के लिए अपने अनमोल रिश्तों की आहुति मत दे देना। ये हवेली देखो, जिसके लिए मैंने अपनों से नाता तोड़ लिया – आज यहाँ कबूतरों का डेरा है। जब जीवन की यात्रा में तुम तालमेल बिठाकर चलोगे, तभी प्रेम और सुख बचेगा।”

यह सुनकर दोनों पुत्र पिता की गोद में गिर पड़े और रोने लगे। उन्होंने सच्चाई समझ ली थी।

शिक्षा:
जीवन एक यात्रा है और हर संसाधन – धन, संपत्ति, ऐश्वर्य – बस थोड़ी देर का विश्राम स्थल है। रिश्ते अनमोल होते हैं। छोटे-छोटे स्वार्थों के लिए उन्हें खो देना मूर्खता है। जैसे बस की सीट पर सवारियाँ बदलती रहती हैं,वैसे ही इस संसार में भी सब कुछ क्षणिक है। बस, प्रेम और तालमेल से चलो,यही सच्चा खजाना है..!!
🙏🙏🏿🙏🏼जय श्री कृष्ण🙏🏽🙏🏻🙏🏾

सुबह का समय था। सूरज की हल्की किरणें खिड़की से झाँक रही थीं, पर कमरे के भीतर अब भी अंधेरा पसरा था — ठीक वैसे ही जैसे राघव के मन में।
कभी हँसमुख, ऊर्जावान, और सबका चहेता रहा राघव अब उदास रहने लगा था।
न नौकरी में मन लगता, न दोस्तों से मिलना अच्छा लगता।
हर चीज़ उसे बोझ लगने लगी थी।

एक दिन उसकी माँ धीरे से कमरे में आईं और बोलीं —
“बेटा, चलो आज मंदिर चलते हैं।”
राघव ने थके हुए स्वर में कहा, “माँ, मन नहीं है।”
माँ मुस्कुराईं, “चलो, बस पाँच मिनट… शायद वहाँ मन मिल जाए।”

अनमने मन से राघव उनके साथ मंदिर गया।
वहाँ उसने देखा — मंदिर के बाहर एक छोटा-सा लड़का टूटी हुई चप्पल पहने, धूप में खड़ा होकर आने-जाने वालों को प्रसाद बाँट रहा था।
चेहरे पर पसीना था, मगर मुस्कान सच्ची थी।

राघव ने पूछा, “तुम यहाँ रोज़ आते हो?”
लड़के ने सिर हिलाया, “हाँ भैया, सुबह स्कूल जाता हूँ, फिर शाम को यहाँ लोगों की मदद करता हूँ। भगवान का काम करने में मन लगता है।”

राघव ने फिर पूछा, “तुम्हें थकान नहीं होती?”
लड़का बोला, “थकान तो होती है, पर जब कोई ‘धन्यवाद’ कहता है तो लगता है कि मैंने कुछ अच्छा किया। बस वही मेरा सुख है।”

उसकी बात ने राघव को झकझोर दिया।
उसे अहसास हुआ कि वो इसलिए दुखी है क्योंकि उसके पास जीने का कोई उद्देश्य नहीं रहा।
उसका हर दिन बस गुजर रहा था — पर जीया नहीं जा रहा था।

घर लौटकर उसने अपनी पुरानी डायरी निकाली, जिसमें कभी सपनों की लंबी सूची लिखी थी —
गरीब बच्चों के लिए पुस्तकालय खोलना,पेड़ लगाना,लोगों को मुस्कुराना सिखाना।

उसने पन्नों को देखा और सोचा —
“मैंने खुद ही अपने जीवन का अर्थ खो दिया था।”

अगले दिन से उसने एक छोटा-सा अभियान शुरू किया —
अपने इलाके के बच्चों को पढ़ाने का।
शुरू में तीन बच्चे आए, फिर दस, फिर बीस…
हर शाम जब वे बच्चे हँसते हुए “धन्यवाद भैया” कहते,
राघव को लगता कि अब उसके जीवन का सूरज सच में उग आया है।

कुछ महीनों बाद जब किसी ने उससे पूछा —
“तुम अब इतने खुश कैसे रहते हो?”

राघव मुस्कुरा कर बोला — “क्योंकि अब मेरे पास आगे बढ़ने का कारण है…और जब जीवन में उद्देश्य मिल जाए, तो Depression खुद-ब-खुद हार जाता है।”

सीख:
जीवन का दर्द तब तक भारी लगता है जब तक हम अपने अस्तित्व का कारण नहीं ढूंढते।
जैसे ही उद्देश्य मिलता है, हर सुबह एक नई शुरुआत बन जाती है।

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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।
🙏 ।।राम_राम।। 🙏

सुन्दरपुर गांव में एक किसान रहता था। उसके चार बेटे थे। वे सभी आलसी और निक्कमे थे। जब किसान बुढ़ा हुआ तो उसे बेटों की चिंता सताने लगी।

एक बार किसान बहुत बीमार पड़ा। मृत्यु निकट देखकर उसने चार बेटों को अपने पास बुलाया। उसने उस चारों को कहा, “मैंने बहुत-सा धन अपने खेत में गाड रखा है। तुम लोग उसे निकाल लेना।” इतना कहते-कहते किसान के प्राण निकल गए।

पिता का क्रिया-क्रम करने के बाद चारों भाइयों ने खेत की खुदाई शुरू कर दी। उन्होंने खेत का चप्पा-चप्पा खोद डाला, पर उन्हें कही धन नहीं मिला। उन्होंने पिता को खूब कोसा। वर्षा ऋतु आने वाली थी। किसान के बेटों ने उस खेत में धान के बीज बो दिए। वर्षा का पानी पाकर पौधे खूब बढ़े। उन पर बड़ी-बड़ी बालें लगी। उस साल खेत में धान की बहुत अच्छी फसल हुई।

चारों भाई बहुत खुश हुए। अब पिता की बात का सही अर्थ उनकी समझ में आ गया। उन्होंने खेत की खुदाई करने में जो परिश्रम किया था, उसी से उन्हें अच्छी फसल के रूप में बहुत धन मिला था।

इस प्रकार श्रम का महत्व समझने पर चारों भाई मन लगाकर खेती करने लगे।

शिक्षा:-
परिश्रम ही सच्चा धन है।

सदैव प्रसन्न रहिये – जो प्राप्त है, पर्याप्त है।
जिसका मन मस्त है – उसके पास समस्त है।।

एक बार एक छोटे से गाँव में एक साधु रहते थे — नाम था स्वामी चैतन्यदास। उनके पास दिनभर लोग अपनी समस्याएँ लेकर आते — कोई कहता धन नहीं टिकता, कोई कहता मन नहीं टिकता, कोई कहता घर में शांति नहीं।

एक दिन गाँव के सबसे अमीर व्यक्ति, शंभू सेठ, उनके पास पहुँचे। बोले —
“स्वामी जी, मेरे पास सब कुछ है — धन, घर, परिवार — लेकिन मन में एक अजीब अंधेरा है। कुछ भी अच्छा नहीं लगता। कृपया मुझे प्रकाश दीजिए।”

स्वामी मुस्कुराए और बोले —
“आज रात तुम मेरे साथ पहाड़ी पर चलो, तुम्हें तुम्हारा प्रकाश दिखाऊँगा।”

रात हुई। दोनों पहाड़ी पर पहुँचे।
स्वामी ने एक छोटा-सा दीपक जलाया और बोले —
“देखो शंभू, इस दीपक की लौ दीवार पर कैसी छाया बना रही है?”

शंभू बोले — “जी हाँ, दीवार पर तो मेरी और आपकी परछाई स्पष्ट दिख रही है।”

स्वामी ने कहा —
“अब ध्यान से देखो,”
और उन्होंने दीपक बुझा दिया।

अंधकार छा गया।
शंभू घबरा गए — “स्वामी जी! अब तो कुछ भी दिखाई नहीं दे रहा!”

स्वामी शांत स्वर में बोले —
“यही बात समझो, शंभू — जैसे दीपक बुझते ही छाया लुप्त हो जाती है, वैसे ही जब मन का प्रकाश — चेतना बुझ जाती है, तब जगत की सारी छवियाँ, सारी मायाएँ, सब अर्थहीन लगने लगती हैं।”

उन्होंने आगे कहा —
“यह संसार वैसा ही है जैसा तुम्हारे भीतर का दीपक उसे दिखाता है। अगर तुम्हारे भीतर प्रकाश है — प्रेम, शांति, जागरूकता — तो दुनिया सुंदर लगती है। अगर भीतर अंधकार है — लोभ, ईर्ष्या, मोह — तो यही जगत बोझ बन जाता है।”

शंभू चुपचाप सुनते रहे।
उनकी आँखों से आँसू बह निकले। उन्होंने कहा —
“स्वामी जी, अब समझ आया… मेरा दीपक तो मैं खुद बुझा चुका था।”

स्वामी मुस्कुराए —
“दीपक फिर जलाओ, शंभू। दूसरों की बातों, धन-दौलत या दिखावे से नहीं — अपने भीतर की चेतना के तेल से। फिर देखना, न तुम्हें छाया डराएगी, न अंधकार।”

उस रात शंभू सेठ लौटे तो उनके चेहरे पर एक नई रोशनी थी।
कहते हैं, उसके बाद उन्होंने हर सुबह अपने मन के दीपक को प्रेम और ध्यान से जलाना शुरू किया — और सच में, उनके जीवन का अंधकार मिट गया।

सन्देश:
दीवार पर छाया तभी दिखती है जब दीपक जलता है।
और जीवन में संसार तभी सुंदर लगता है जब चेतना जागृत होती है।
दीपक बुझते ही छाया नहीं रहती —
चेतना बुझते ही “मैं” और “मेरा” सब मिट जाता है।
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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।
🙏 ।।राम_राम।। 🙏

सेठ ने अभी दुकान खोली ही थी कि :- एक औरत आई और बोली :- “सेठजी ये अपने दस रुपये लो”।👍🙏

😳 सेठ उस गरीब सी औरत को प्रश्नवाचक नजरों से देखने लगा, जैसे पूछ रहा हो ? कि :- मैंने कब तुम्हे दस रुपये दिये ? 😳

😳 औरत बोली :- कल शाम को मै सामान ले गई थी l तब आपको सौ रुपये दिये थे। 70 रुपये का सामान खरीदा था। आपने 30 रुपये की जगह मुझे 40 रुपये वापस दे दिये। “सेठ ने दस रुपये को माथे से लगाया, फिर गल्ले मे डालते हुए बोला :- एक बात बयाइये बहनजी? आप सामान खरीदते समय कितने मौल भाव कर रही थी। पांच रुपये कम करवाने के लिए आपने कितनी बहस की थी और अब ये दस रुपये लौटाने चली आई? 🤔

औरत बोली :-“पैसे कम करवाना मेरा हक है”। मगर एक बार मौल भाव होने के बाद, “उस चीज के कम पैसा देना पाप है।” 😳🤫

😳 सेठ बोला :- लेकिन आपने कम पैसे कहाँ दिये? आपने पूरे पैसे दिये थे, ये दस रुपया तो मेरी गलती से आपके पास चला गया। रख लेती, तो मुझे कोई फर्क नही पड़ने वाला था। औरत बोली :- आपको कोई फर्क नही पड़ता ? मगर मेरे मन पर हमेशा ये बोझ रहता ? कि:- मैंने जानते हुए भी, आपके पैसे खाये। 🤫 इसलिए मै रात को ही, आपके पैसे वापस देने आई थी l मगर उस समय आपकी दुकान बन्द थी। 😳 सेठ ने महिला को आश्चर्य से देखते हुए पूछा :- “आप कहाँ रहती हो” ? वह बोली ;- “सेक्टर आठ मे रहती हूँ”। सेठ का मुँह खुला रह गया ? 🤔 बोला :- “आप 7 किलोमीटर दूर से”, ये दस रुपये देने, “दूसरी बार आई हो” ?😳🤔 औरत सहज भाव से बोली :- “हाँ दूसरी बार आई हूँ”। मन का सुकून चाहिए, तो – “ऐसा करना पड़ता है”। मेरे पति इस दुनिया मे नही है l मगर उन्होंने मुझे एक ही, बात सिखाई है l कि:- “दूसरे के हक का एक पैसा भी मत खाना”। 🤫क्योंकि :- “इंसान चुप रह सकता हैं ? मगर – “ऊपर वाला कभी भी, हिसाब मांग सकता है ? 🤫 और “उस हिसाब की सजा 👍 मेरे बच्चों को भी मिल सकती है”। 🤫 इतना कह कर वह औरत चली गई।🤫😳

😳 सेठ ने तुरंत गल्ले से तीन सौ रुपये निकाले और स्कूटी पर बैठता हुआ अपने नौकर से बोला :- तुम दुकान का ख्याल रखना, मै अभी आता हूँ। सेठ बाजार मे ही, एक दुकान पर पहुंचा। फिर उस दुकान वाले को तीन सौ रुपये देते हुए बोला :- ये अपने तीन सौ रुपये लीजिए प्रकाशजी। कल जब आप सामान लेने आये थे, तब हिसाब मे ज्यादा जुड़ गए थे।😳प्रकाश हँसते हुए बोला :- “पैसे हिसाब मे ज्यादा जुड़ गए थे, तो आप तब दे देते “? “जब मै दुबारा दुकान पर आता”। इतनी सुबह सुबह आप तीन सौ रुपये देने चले आये।😳🤔

😳 सेठ बोला, :- जब आप दुबारा आते ? 💯✅ “तब तक मै मर जाता तब” ?? आपके मुझ मे तीन सौ रुपये निकलते है, ये आपको तो पता ही नही था, न ? इसलिए देना जरूरी था। पता नही ? “ऊपर वाला कब हिसाब मांगने लग जाए”? 😳🤔 और “उस हिसाब की सजा मेरे बच्चों को भी, मिल सकती है”?।😳🤫

*😳 सेठ तो चला गया ? मगर प्रकाश के दिल मे खलबली मच गई क्योंकि दस साल पहले उसने अपने एक दोस्त से “तीन लाख रुपये” उधार लिए थे। मगर पैसे देने के दूसरे ही दिन, 👉 “दोस्त मर गया था”।

😳 दोस्त के घर वालों को पैसों के बारे मे पता नही था। इसलीए किसी ने उससे पैसे वापस नही मांगे थे। प्रकाश के दिल मे 😀 लालच 😀 आ गया था। इसलिए खुद पहल करके पैसे देने वह नही गया। आज दोस्त का परिवार गरीबी मे जी रहा था। दोस्त की पत्नी लोगों के घरों मे झाडू पौंछा करके बच्चों को पाल रही थी। फिर भी, प्रकाश उनके पैसे हजम किये बैठा था। सेठ का ये वाक्य ” पता नही ? “कब ऊपर वाला हिसाब मांगने बैठ जाए” ? और “उस हिसाब की सजा मेरे बच्चों को भी, मिल सकती है” l “प्रकाश को डरा रहा था” ।😳🤫

😳 प्रकाश दो तीन दिन तक टेंशन में रहा। 👆 आखिर मे उसका जमीर जाग गया। उसने बैंक से तेरह लाख रुपये निकाले और पैसे लेकर दोस्त के घर पहुँच गया। दोस्त की पत्नी घर पर ही थी। वह अपने बच्चो के पास बैठी बतिया रही थी, कि प्रकाश जाकर उसके पैरों मे गिर गया। एक एक रुपये के लिए संघर्ष कर रही, उस “विधवा औरत” के लिए 13 लाख रुपये बहुत बड़ी रकम थी। पैसे देखकर उसकी आँखों मे आँसू आ गए। वह प्रकाश को “दुआएं” देने लगी, जो उसने ईमानदारी दिखाते हुए, पैसे लौटा दिये।👌👍

😳🤫 “ये वही औरत थी”, “जो” “सेठ को दस रुपये लौटाने, दो बार गई थी”।😳🤫

💥 अपनी “मेहनत” और “ईमानदारी”का खाने वालो की ईश्वर “परीक्षा” जरूर लेता है मगर कभी भी, उन्हे अकेला नही छोड़ता। एक दिन जरूर सुनता है। 👌👌👌 “ऊपर वाले पर भरोसा रखिये”।👌🙏
🙏🏾🙏🏼🙏जय श्री कृष्ण🙏🏻🙏🏽🙏🏿

— जो कार्य, ईमानदारी और आत्ममूल्य को सुंदर ढंग से दर्शाती है।

एक सरकारी दफ़्तर में गुलशन कुमार नाम का एक कर्मचारी बीस साल से काम कर रहा था। वह समय पर आता, काम में कभी लापरवाही नहीं करता, लेकिन उसकी एक आदत थी — वह अपने काम को लेकर कभी दिखावा नहीं करता था।

दफ़्तर में बाकी लोग अक्सर बॉस के आगे-पीछे घूमते रहते, छोटी-छोटी बातें बढ़ा-चढ़ाकर बताते, ताकि उनका नाम ऊँचा हो और उन्हें जल्दी प्रमोशन मिल जाए।

गुलशन बस मुस्कुरा देता।
वह सोचता — “मुझे अपने काम से प्रमोशन चाहिए, चापलूसी से नहीं।”

एक दिन नया अफ़सर मनीष वर्मा ऑफिस में आया।
पहले ही हफ्ते उसने देखा कि सब उसके आगे कुर्सी खींच रहे हैं, रिपोर्ट दिखा रहे हैं, लेकिन एक व्यक्ति है जो चुपचाप अपने कोने में काम कर रहा है — वही गुलशन।

मनीष ने एक दिन उसे बुलाया औ पूछा,
“गुलशन, तुम इतना शांत क्यों रहते हो? प्रमोशन नहीं चाहिए तुम्हें?

गुलशन ने हल्के से मुस्कुराकर कहा,
“सर, प्रमोशन मिल जाए तो अच्छा है, लेकिन अगर काम का सम्मान न हो, तो कुर्सी की ऊँचाई बेकार है।”
यह बात मनीष के दिल को छू गई

कुछ महीनों बाद मंत्रालय से आदेश आया कि विभाग में एक अधिकारी पद खाली हुआ है और उसी से कोई एक कर्मचारी प्रमोट किया जाएगा।
सभी कर्मचारियों ने मनीष के चारों ओर खुशामद का जाल बुनना शुरू कर दिया। किसी ने महँगा तोहफ़ा दिया, किसी ने मीठी बातें।

पर मनीष शांत रहा।
उसने सिर्फ़ फ़ाइलें और रिकॉर्ड देखने शुरू किए — किसने कितनी मेहनत से, कितनी ईमानदारी से काम किया है।

जब लिस्ट आई — सब हैरान रह गए।
प्रमोशन मिला गुलशन कुमार को।

बाकी लोगों ने ताने मारे —
“किस्मत अच्छी है तेरी, वरना तेरा नंबर कहाँ आता?”

गुलशन बस इतना बोला,
“शायद आज किसी ने किस्मत नहीं, कर्म देखा।”

कुछ दिन बाद मनीष ने कहा,
“गुलशन, तुम्हारे प्रमोशन के पीछे सिर्फ़ रिपोर्ट नहीं, तुम्हारी सोच भी थी। मैंने देखा — तुमने कभी शिकायत नहीं की, बस काम किया। यही असली नेतृत्व की निशानी है।”

गुलशन की आँखों में चमक आ गई।
उसने महसूस किया — प्रमोशन सिर्फ़ पद नहीं होता, यह उस विश्वास का प्रमाण होता है जो आप अपने काम से अर्जित करते हैं।

सीख:

> “चापलूसी से मिली कुर्सी कुछ दिन चलती है,
> पर ईमानदारी से जीता गया सम्मान उम्रभर साथ रहता है।”
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सदैव प्रसन्न रहिये।
जो प्राप्त है, वो पर्याप्त है।।
🙏 ।।राम_राम।। 🙏